आम जनता की गाड़ी कमाई लेकर भागने वाली पोंज़ी स्कीम आजकल खूब सुर्ख़िय बटोर रही हैं. ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल के शारधा ग्रुप का हैं जिसके दिवालिया होने के कारण निवेशको के 30 हज़ार करोड़ रूपये डूबने का खतरा हैं
चिट फण्ड कंपनिया गरीब और अशिक्षित तबके को बाज़ार भाव से ज्यादा ब्याज का भरोसा देकर, रकम जमा करने को राज़ी करा लेती हैं. शुरुआत में ये देती भी हैं लेकिन जब निवेश मिलना बंद हो जाता हैं ये जमा पूंजी लेकर फरार हो जाती हैं .स्पीक एशिया, उल्लास किरकिरे आदि जैसे मामले सामने आने के बाद भी इन कंपनियों के लिए स्पष्ट कानून और नियामक का अभाव हैं इसी कारण इन पर कार्यवाही मुश्किल होती हैं. एक अनुमान के अनुसार चिट फण्ड कंपनियों के पास 30 ट्रिलियन रूपये जमा हैं जो सार्वजनिक बैंकों में जमा 64.2 ट्रिलियन(फरवरी 2013) का करीब आधा हैं.
धोखे के इस धंधे पर नकेल कसने के लिए स्वतंत्र नियामक का गठन करना होगा ,सेबी को भी प्रयाप्त संसाधन देने होंगे,केंद्र और राज्य की अलग आलग ज़िम्मेदारी तय हो. लोगो को बैंकिंग के दायरे में लाना होगा.साथ ही निवेशको को भी जागरूक और छोटी बचत को आकर्षक बनाने की ज़रूरत हैं
मंथन
Thursday, 9 May 2013
Wednesday, 8 May 2013
गार : एक और नीतिगत लकवे का शिकार हुई सरकार
भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) पर बढ़ती जा रही हैं. सरकार इन्हें लुभाने के लिए कई खतरनाक रियायते
दे रही हैं. जनरल एंटी अवयडेनस रूल (गार) को टालने का फैसला इसी की एक कड़ी हैं.
गार
का उद्देश्य टैक्स बचाने के मकसद से टैक्स व्यवस्था के छेदों को भरना था. लेकिन
पिछले साल बजट में इसकी घोषणा के बाद एफआईआई
ने अरबो डॉलर निकाल लिए. इससे घबराकर सरकार ने इसे 2016 तक
टाल दिया हैं. ज्ञात हो एफआईआई अपनी मर्ज़ी से आते हैं
और रियायत के साथ मुनाफे में टैक्स नहीं देना चाहते. इसके लिए दोहरा कराधान संधि वाले 70
देशो का इस्तेमाल किया जाता हैं. एक अनुमान के अनुसार मॉरिशस रूट से विदेशी
पूंजी का 40% हिस्सा आता हैं, जिसमे पी नोट्स की बढ़ी हिस्सेदारी हैं. पी
नोट्स में निवेशको की पहचान गुप्त होती हैं और इससे काले धन के प्रवाह का खतरा रहता हैं. सेबी
और आरबीआई इस पर आपत्ति उठा चुके हैं.
गार
को टालना कर राजस्व का नुकसान हैं,साथ ही काले धन को लेकर हमारी प्रतिबद्धता की
पोल खुल गयी और सरकार फिर नीतिगत अपंगता का शिकार हो गयी हैं.
Saturday, 4 May 2013
सीबीआई को स्वायत्त करने का मौका
सीबीआई की स्वायत्तता पर हमेशा से बहस होती रही हैं. लोकपाल आन्दोलन में भी ये प्रमुख मांग थी. सुप्रीम कोर्ट की हालिया फटकार सीबीआई पर सरकारी दबाव की तस्दीक करती हैं
अक्सर देखा गया हैं कि सत्तारुढ पार्टी सीबीआई का दुरोपयोग खुद को बचाने और विरोधियो को घेरने के लिए करती हैं. कोलगेट मामले में भी यही हुआ. अदालत ने दो टूक कहा कि सीबीआई अपने राजनैतिक आकाओ के कहने पर न चले. 1978 में एलपी सिंह समिति ने सीबीआई की स्वायत्ता के लिए विस्तृत अधिनियम बनाने पर जोर दिया था. 1997 जैन हवाला केस में जस्टिस जे.एस वर्मा ने सीबीआई को सीवीसी के अधीन करने, सीबीआई के निदेशक को नियुक्ति के लिए पैनल बनाने, उसे 3 वर्ष का निश्चित कार्यकाल देने, और बिना सरकारी आज्ञा अभियोजन चलाने के निर्देश दिए थे.लेकिन अभी तक इसका पालन नहीं हुआ हैं .
सीबीआई में सुधार की शुरुआत अफसरों की नियुक्ति,तबादले और बर्खास्ती की प्रक्रिया में पारदर्शिता से हो, वित्तीय दृष्टि से भी स्वायत्ता मिले और एक अधिनियम अलग से पारित हो. सुप्रीम कोर्ट की लगातार फटकार के बाद अब सीबीआई के पास छवि सुधारने का सुनहरा मौका हैं जिससे जनता का भरोसा फिर से जीता जा सके.
Thursday, 2 May 2013
कब बदलेगा पुलिस का चेहरा
भारत की आजादी को छ दशक हो गये.लेकिन
हमारी पुलिस आज भी 1861 के कानून के तहत चल रही हैं. अदालत की फटकारो के बावजूद इसका चेहरा
नहीं बदल रहा. दिल्ली, पंजाब, बिहार और यूपी की घटनाए इसका उदहारण हैं.
गौरतलब
हैं सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ 2006 मामले में पुलिस को पेशेवर, जनभावना
की कद्र करने वाले और राजनैतिक दखल से मुक्त करने के निर्देश दिए थे. लेकिन
इन निर्देशों को लेकर केंद्र और राज्य न नुकुर कर रहे हैं.क्यूंकि कोई भी सत्तारुढ दल पुलिस के
मनमाने इस्तेमाल को नहीं छोड़ना चाहता. पुलिस सुधार पर गठित राष्ट्रिय पुलिस सुधार आयोग समेत
दर्जनभर समितियो की सिफारिशे ठन्डे बसते में हैं.
अब
समय आ गया हैं जब पुलिस से आवाम की शिकायत निपटारे के लिए आयोग गठित हो,तबादले
और पदोन्नति के लिए स्वतंत्र बोर्ड बने और जाँच की जिम्मेदारी पुलिस पर न होकर
स्वायत्त एजेंसी पर हो जिसकी सिफारिश पद्मनाभ्य्या समिति ने दी थी .साथ
ही पुलिस को लैंगिक शिक्षा दी जाये और वेतन ढर्रे में सुधार हो .सुप्रीम
कोर्ट को भी अब इसके लिए आगे आना होगा.
Wednesday, 1 May 2013
नोवार्टिस पेटेंट केस:राहत के साथ चुनौतियाँ भी
सुप्रीम कोर्ट ने स्विस दावा कंपनी नोवार्टिस
की पेटेंट याचिका ख़ारिज कर करोडो मरीजों और घरेलू दावा कंपनियों को रहत दी हैं .नोवार्टिस
की दावा ग्लीविक की कीमत जहाँ प्रति माह
1लाख 20 हज़ार हैं. वही इसके जेनरिक संस्करण की कीमत 12
हज़ार रूपये हैं
ज्ञात हो वैश्विक फार्मा उद्योग 800
अरब डॉलर का हैं, जिसमे भारत का योगदान 225 करोड़
डॉलर हैं. यूनिसेफ
द्वारा वितरित की जाने वाली दवाओ का दूसरे नंबर का आपूर्तिकर्ता देश भारत ही हैं. अक्सर
देखा गया हैं की बहुराष्ट्रीय कंपनिया पुराने आविष्कार में सुधार कर पेटेंट का
दावा पेश करती हैं.ताज़ा फैसले से शोध खर्च के मनमाने आंकड़े पेश
करने और फेरबदल को नया अनुसंधान बताने में अंकुश लगेगा. हांलाकि एम्.एन.सी का कहना भी ठीक हैं कि अब कंपनी नयी दवा लाने में संकोच करेगी और मरीजों की जेनरिक दवाओ पर निर्भरता बढेगी. लेकिन यहाँ देखना होगा कि दवा बनाने का उद्देश्य मुनाफा कमाना हैं या मरीजों की जान बचाना.
भारत
का पेटेंट कानून प्रगतिशील और मानवीय सरोकारों वाला हैं.साथ ही भारत ने डब्लूटीओ के पेटेंट
कानून (ट्रीप्स) पर
हस्ताक्षर किये हैं.इस फैसले के बाद विकसित देश डब्लूटीओ पर इस
कानून में बदलाव के लिए दबाव डालेंगे.ऐसे में विकासशील देश घरेलू दवाओ को
प्रोत्साहित करे,अनुसंधान और विकास को बढावा दे जिससे विदेशी
दवाओ पर निर्भरता घटे और मरीज़ अकाल मौत का शिकार न बने
Thursday, 18 April 2013
शिक्षा का अधिकार: तीन साल में क्या खोया,क्या पाया
शिक्षा के अधिकार (आरटीई) कानून
तीन साल का हो गया हैं.लेकिन
इन तीन सालो ने यह सिखाया कि सही कानून बिना प्रशासनिक दक्षता के नतीजे नहीं दे
सकता. तय मापदंडो को पूरा करने की अवधि समाप्त
हो गयी मगर नतीजे इसकी पोल खोल रहे हैं.
गैर सरकारी संस्था प्रथम द्वारा जारी रिपोर्ट ‘असर’ में साफ़ कहा हैं देश में 12 लाख शिक्षको की कमी हैं 20% से ज्यादा शिक्षक अप्रशिक्षित हैं.शिक्षक विद्यार्थी के अनुपात में बड़ा अंतर
हैं.पांचवी कक्षा के 53
फीसदी बच्चे
कक्षा दो का पाठ तो दूर 2 अंक का जोड़ घटाना भी नहीं जानते .स्कूलों में पीने के पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा नहीं हैं
जिसके कारण बच्चे बीच में ही पढाई छोड़ रहे हैं .साथ ही शिक्षा में भी खर्च जीडीपी का 3.5% हैं जबकि कोठारी आयोग ने 6% की
सिफारिश की हैं.
इन तीन सालो में बहस स्कूलों में 25 फीसदी आरक्षण लागू कराने और नामांकन बढाने पर रही. जबकि गुणवत्ता और
कौशलपूर्ण शिक्षा की ज़रूरत हैं .पाठ्यक्रम को रोचक और व्यव्क्तित्व निर्माण के
अनुकूल बनाना होगा.अब तक केवल 18 राज्यों ने ही अपना पाठ्यक्रम
सुधारा हैं.कोठारी आयोग की सामानांतर स्कूल प्रणाली की सिफारिश लागू हो और शिक्षको
को उचित प्रशिक्षण मिले.क्यूंकि शिक्षा किसी भी देश की दिशा बदल सकती हैं
Saturday, 13 April 2013
न्याय प्रणाली में सुधार : देर से मिला न्याय,न्याय नहीं
न्याय प्रणाली में सुधार के लिए हमेशा से बातें
होती रही हैं.अदालतों में लंबित मामलो के कारण जनता का
न्यायिक तंत्र से विश्वास उठ रहा हैं.कहा भी गया हैं देर से मिला न्याय,न्याय
नहीं होता.दिल्ली
में हुए न्यायधीशो के सम्मलेन में भी ये मुद्दा जोर शोर से उठा.
अगर आंकड़ो में देखे तो इस समय अदालतों में 3
करोड़ मामले लंबित हैं,जिसमे 26 फीसदी की अवधि
पांच साल से अधिक हैं.साथ ही प्रति 10 लाख लोगो में 1 जज
हैं .निचली
अदालतों में जजों के 3777 और हाई कोर्ट में 270 पद
रिक्त हैं.2012
में वर्ल्ड जस्टिस द्वारा जारी रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स में भारत 97 देशो
की सूची में 78वे स्थान पर था.
न्यायिक प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए जजों
की संख्या में वृद्धि करनी होगी.प्रॉसिक्यूशन सिस्टम को मजबूत और बेवजह स्थगन पर
अंकुश लगाना होगा .साथ ही प्री कोर्ट प्रोसेडिंग लाई जाय जिससे मामले अदालत में
जाने से पहले ही निपट जाये.ग्राम न्यायलय की स्थापना हो और विधि आयोग की सिफ़ारिशो
को लागू किया जाये.फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा मामलो को जल्दी निपटाए क्यूंकि न्याय
की कठोरता नहीं बल्कि उसकी तत्परता अपराधो को रोकती हैं
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