सुप्रीम कोर्ट ने स्विस दावा कंपनी नोवार्टिस
की पेटेंट याचिका ख़ारिज कर करोडो मरीजों और घरेलू दावा कंपनियों को रहत दी हैं .नोवार्टिस
की दावा ग्लीविक की कीमत जहाँ प्रति माह
1लाख 20 हज़ार हैं. वही इसके जेनरिक संस्करण की कीमत 12
हज़ार रूपये हैं
ज्ञात हो वैश्विक फार्मा उद्योग 800
अरब डॉलर का हैं, जिसमे भारत का योगदान 225 करोड़
डॉलर हैं. यूनिसेफ
द्वारा वितरित की जाने वाली दवाओ का दूसरे नंबर का आपूर्तिकर्ता देश भारत ही हैं. अक्सर
देखा गया हैं की बहुराष्ट्रीय कंपनिया पुराने आविष्कार में सुधार कर पेटेंट का
दावा पेश करती हैं.ताज़ा फैसले से शोध खर्च के मनमाने आंकड़े पेश
करने और फेरबदल को नया अनुसंधान बताने में अंकुश लगेगा. हांलाकि एम्.एन.सी का कहना भी ठीक हैं कि अब कंपनी नयी दवा लाने में संकोच करेगी और मरीजों की जेनरिक दवाओ पर निर्भरता बढेगी. लेकिन यहाँ देखना होगा कि दवा बनाने का उद्देश्य मुनाफा कमाना हैं या मरीजों की जान बचाना.
भारत
का पेटेंट कानून प्रगतिशील और मानवीय सरोकारों वाला हैं.साथ ही भारत ने डब्लूटीओ के पेटेंट
कानून (ट्रीप्स) पर
हस्ताक्षर किये हैं.इस फैसले के बाद विकसित देश डब्लूटीओ पर इस
कानून में बदलाव के लिए दबाव डालेंगे.ऐसे में विकासशील देश घरेलू दवाओ को
प्रोत्साहित करे,अनुसंधान और विकास को बढावा दे जिससे विदेशी
दवाओ पर निर्भरता घटे और मरीज़ अकाल मौत का शिकार न बने

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