Wednesday, 8 May 2013

गार : एक और नीतिगत लकवे का शिकार हुई सरकार


भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) पर बढ़ती जा रही हैंसरकार इन्हें लुभाने के लिए कई खतरनाक रियायते दे रही हैं. जनरल एंटी अवयडेनस रूल (गार) को टालने का फैसला इसी की एक कड़ी हैं.

गार का उद्देश्य टैक्स बचाने के मकसद से टैक्स व्यवस्था के छेदों को भरना थालेकिन पिछले साल बजट में इसकी घोषणा के बाद एफआईआई ने अरबो डॉलर निकाल लिए.  इससे घबराकर सरकार ने इसे 2016 तक टाल दिया हैंज्ञात हो एफआईआई अपनी मर्ज़ी से आते हैं और रियायत के साथ मुनाफे में टैक्स नहीं देना चाहतेइसके लिए दोहरा कराधान संधि वाले 70 देशो का इस्तेमाल किया जाता हैंएक अनुमान के अनुसार मॉरिशस रूट से विदेशी पूंजी का 40% हिस्सा आता हैं, जिसमे पी नोट्स की बढ़ी हिस्सेदारी  हैं. पी नोट्स में निवेशको की पहचान गुप्त होती हैं और इससे काले धन के प्रवाह का खतरा रहता हैंसेबी और आरबीआई इस पर आपत्ति उठा चुके हैं.
    
गार को टालना कर राजस्व का नुकसान हैं,साथ ही काले धन को लेकर हमारी प्रतिबद्धता की पोल खुल गयी और सरकार फिर नीतिगत अपंगता का शिकार हो गयी हैं.               

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