भारत की आजादी को छ दशक हो गये.लेकिन
हमारी पुलिस आज भी 1861 के कानून के तहत चल रही हैं. अदालत की फटकारो के बावजूद इसका चेहरा
नहीं बदल रहा. दिल्ली, पंजाब, बिहार और यूपी की घटनाए इसका उदहारण हैं.
गौरतलब
हैं सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ 2006 मामले में पुलिस को पेशेवर, जनभावना
की कद्र करने वाले और राजनैतिक दखल से मुक्त करने के निर्देश दिए थे. लेकिन
इन निर्देशों को लेकर केंद्र और राज्य न नुकुर कर रहे हैं.क्यूंकि कोई भी सत्तारुढ दल पुलिस के
मनमाने इस्तेमाल को नहीं छोड़ना चाहता. पुलिस सुधार पर गठित राष्ट्रिय पुलिस सुधार आयोग समेत
दर्जनभर समितियो की सिफारिशे ठन्डे बसते में हैं.
अब
समय आ गया हैं जब पुलिस से आवाम की शिकायत निपटारे के लिए आयोग गठित हो,तबादले
और पदोन्नति के लिए स्वतंत्र बोर्ड बने और जाँच की जिम्मेदारी पुलिस पर न होकर
स्वायत्त एजेंसी पर हो जिसकी सिफारिश पद्मनाभ्य्या समिति ने दी थी .साथ
ही पुलिस को लैंगिक शिक्षा दी जाये और वेतन ढर्रे में सुधार हो .सुप्रीम
कोर्ट को भी अब इसके लिए आगे आना होगा.

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