शर्मनाक! ये वाकई शर्मनाक
है। दिल्ली की घटना ने इस समाज को वो आईना दिखाया है जो आज भी नारी को एक भोग की
वास्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझता है। जहा एक और हम विकास के रास्ते पर लगातार आगे
बढ रहे है वही दूसरी ओर महिलाओ के साथ होने वाली दुष्कर्म की घटनाओ में लगातार
बढोतरी होती जा रही है । इस घटना ने न केवल भारत में ही गुस्से का माहौल है बल्कि
विदेश में भी भारत की जमकर बदनामी हो रही है ।ज्यादातर लोगो की मांग है कि दोषियों
को फ़ासी की सजा मिले मगर क्या फ़ासी की सजा ही इस समस्या का समाधान है?
ख़त्म होता कानून का भय
अगर इस घटना के मूल में हम जाये तो ये पाएंगे की
दुष्कर्म करने वाले अपराधियों को कानून का डर नहीं था। पुलिस को
पता चला है कि वे सभी आरोपी उस दिन मस्ती के मूड में थे और उन्होंने रविवार के दिन
कुछ अतिरिक्त कमाई के इरादे से बस को सड़क पर निकाला था। बस में सवार एक यात्री को
वह पहले ही लूट चुके थे और खाने-पीने की पार्टी भी पहले ही कर चुके थे। फिर बस में लड़की के घुसते ही उन्होंने
उससे छेड़छाड़ शुरू कर दी और बाद में जो हुआ, उस
घटनाक्रम से हम सभी परिचित हैं। अब यह भी पता चला है कि अपने पकड़े न जाने को लेकर
वह इतने निश्चिंत थे कि घटना को अंजाम देने के बाद वह अपने घर सोने चले गए थे। यही
नहीं, उन्होंने
दूसरे दिन सड़क पर बस भी निकाली थी। ये साफ़ दर्शाता है की इस
देश में जहा कानून का शासन(rule of
law)वहा कि कानून व्यवस्था कितनी लचर है और साथ ही लोगो के अन्दर कानून का डर भी नहीं है।
इसमें सबसे बड़ा दोष है न्याय प्रणाली का
जो बेहद सुस्त है और इसी का फयदा उठा कर अपराधी आज खुले आम घूम रहे है। आज दुष्कर्म और महिलाओ से जुड़े बहुत सारे कानून
इस देश में मौजूद है मगर देखने में आया है कि अधिकांश मामलों में
दुष्कर्म का आरोप सिद्ध ही नहीं हो पाता और दुष्कर्मी बाइज्जत बरी हो जाते हैं।गृह
मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक
बलात्कार के कुल दर्ज मामलों में लगभग एक चौथाई में ही आरोपियों को सजा मिल पाती
है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को रोकने के लिए गृह मंत्रालय ने सितंबर 2009 में विस्तृत एडवाइजरी जारी
की थी । इसमें राज्य सरकारों को दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई, मामले की अच्छी तरह से जांच करने, बलात्कार की जांच
में देरी को न्यूनतम करने, सभी जिलों में महिला अपराध प्रकोष्ठ
बनाने के साथ-साथ विशेष महिला अदालतें स्थापित करने की सलाह दी गई थी। लेकिन अभी
तक इसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका है। पुलिस का रवय्या भी इन घटनाओ में बहुत ही लापरवाह और अपमानजनक होता है ।थाने में आयी
महिलाओ से उलजलूल सवाल पूछे जाते है और उनके चरित्र में भी ऊँगली उठाई जाती है इसी
कारण कई मामलो में महिलाए पुलिस में एफआईआर दर्ज करने से हिचकती है ।2010 में
सीआरपीसी में बेहद महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे। इनमें दुष्कर्म की शिकार महिला के
बयान थाने में न बुलाकर उसकी सुविधाजनक जगह पर लिया जाना, पीडि़त, दोषी और
गवाहों के बयानों की ऑडियो, वीडियो रिकॉर्डिग करना, पीडि़त को
तुरंत मेडिकल सहायता उपलब्ध कराना, 24 घंटे के अंदर मेडिकल कराकर एफआइआर के साथ
मेडिकल रिपोर्ट की कॉपी नत्थी करना आदि शामिल है। इसके अलावा बेहद महत्वपूर्ण
प्रावधान यह है कि फास्ट ट्रैक अदालतों में ऐसे मामले में तीन माह में फैसला देना
जरूरी है,मगर
देखने में आया है कि इन प्रावधान कि लगातार अनदेखी करी जा रही है । 1995 में सुप्रीमकोर्ट द्वारा विशाखा मामले में दिए गए निर्देशों को मानने में
ही 15 साल लग गए ।ऐसा नहीं है कि तवरित न्याय नहीं हो सकता
इस साल असम में एक लड़की से सार्वजानिक रूप से हुई छेड़खानी का कुछ महीनो बाद ही
फैसला सुनाया गया और आरोपियों को सजा हुई थी। कहने का मतलब यहाँ ये है कि अगर
इच्छाशक्ति हो तो न्याय तवरित दिलाया जा सकता है।
आत्ममंथन की ज़रूरत
प्रस्तुत घटना के बाद मीडिया में यह समाचार भी
छपा है कि देश के विभिन्न महानगरों की 92 फीसद महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।
एसोचैम के सामाजिक विकास संस्थान की ओर से जारी रिपोर्ट से जुड़ा यह सर्वेक्षण
दिल्ली, मंुबई, कोलकाता, बेंगलूर, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे, देहरादून
सहित कई शहरों में किया गया। रिपोर्ट में बताया गया है कि हर 40 मिनट में
एक महिला का अपहरण और दुष्कर्म होता है। शहर की सड़कों पर हर घंटे एक महिला
शारीरिक शोषण की शिकार होती है। हर 25 मिनट में छेड़छाड़ की घटना होती है। प्रश्न
उठता है कि स्ति्रयों को इस असुरक्षा से मुक्ति कैसे और कब मिलेगी?इस प्रश्न पर आत्म मंथन की बहुत ज़रूरत है
क्यूंकि हमारा समाज अभी भी पुरुषप्रधान वाली मानसिकता से पीड़ित है और नारी को एक बोझ समझा जाता है। आज जरुरत है की
परिवार अपने घर के पुरुष सदस्यों को समझाए उनमे बेफिजूल की मर्दानगी के लिए न
उकसाए और युवा वर्ग अपने समुदाय में स्त्रियों के अधिकारों को ज़ोरदार तरीके से
उठाये ।साथ ही महिलायों को भी ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता है ।क्यूकि
कानून राज्य का विषय है तो ये राज्य सरकार की जिम्मेदारी है की वे आपसी राज्यों की
पुलिस से बेहतर तालमेल बनाये ताकि समय रहते आरोपियों को पकड़ा जा सके ।क्यूकि फासी
या ज्यादा कानून बनाना किसी समस्या का समाधान नहीं है ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री
टोनी ब्लेयर ने कहा है “न्याय की कठोरता
नहीं बल्कि उसकी तत्परता किसी अपराध को रोकती है”।