सीबीआई की स्वायत्तता पर हमेशा से बहस होती रही हैं. लोकपाल आन्दोलन में भी ये प्रमुख मांग थी. सुप्रीम कोर्ट की हालिया फटकार सीबीआई पर सरकारी दबाव की तस्दीक करती हैं
अक्सर देखा गया हैं कि सत्तारुढ पार्टी सीबीआई का दुरोपयोग खुद को बचाने और विरोधियो को घेरने के लिए करती हैं. कोलगेट मामले में भी यही हुआ. अदालत ने दो टूक कहा कि सीबीआई अपने राजनैतिक आकाओ के कहने पर न चले. 1978 में एलपी सिंह समिति ने सीबीआई की स्वायत्ता के लिए विस्तृत अधिनियम बनाने पर जोर दिया था. 1997 जैन हवाला केस में जस्टिस जे.एस वर्मा ने सीबीआई को सीवीसी के अधीन करने, सीबीआई के निदेशक को नियुक्ति के लिए पैनल बनाने, उसे 3 वर्ष का निश्चित कार्यकाल देने, और बिना सरकारी आज्ञा अभियोजन चलाने के निर्देश दिए थे.लेकिन अभी तक इसका पालन नहीं हुआ हैं .
सीबीआई में सुधार की शुरुआत अफसरों की नियुक्ति,तबादले और बर्खास्ती की प्रक्रिया में पारदर्शिता से हो, वित्तीय दृष्टि से भी स्वायत्ता मिले और एक अधिनियम अलग से पारित हो. सुप्रीम कोर्ट की लगातार फटकार के बाद अब सीबीआई के पास छवि सुधारने का सुनहरा मौका हैं जिससे जनता का भरोसा फिर से जीता जा सके.

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