न्याय प्रणाली में सुधार के लिए हमेशा से बातें
होती रही हैं.अदालतों में लंबित मामलो के कारण जनता का
न्यायिक तंत्र से विश्वास उठ रहा हैं.कहा भी गया हैं देर से मिला न्याय,न्याय
नहीं होता.दिल्ली
में हुए न्यायधीशो के सम्मलेन में भी ये मुद्दा जोर शोर से उठा.
अगर आंकड़ो में देखे तो इस समय अदालतों में 3
करोड़ मामले लंबित हैं,जिसमे 26 फीसदी की अवधि
पांच साल से अधिक हैं.साथ ही प्रति 10 लाख लोगो में 1 जज
हैं .निचली
अदालतों में जजों के 3777 और हाई कोर्ट में 270 पद
रिक्त हैं.2012
में वर्ल्ड जस्टिस द्वारा जारी रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स में भारत 97 देशो
की सूची में 78वे स्थान पर था.
न्यायिक प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए जजों
की संख्या में वृद्धि करनी होगी.प्रॉसिक्यूशन सिस्टम को मजबूत और बेवजह स्थगन पर
अंकुश लगाना होगा .साथ ही प्री कोर्ट प्रोसेडिंग लाई जाय जिससे मामले अदालत में
जाने से पहले ही निपट जाये.ग्राम न्यायलय की स्थापना हो और विधि आयोग की सिफ़ारिशो
को लागू किया जाये.फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा मामलो को जल्दी निपटाए क्यूंकि न्याय
की कठोरता नहीं बल्कि उसकी तत्परता अपराधो को रोकती हैं

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