उभरती हुई अर्थव्यवस्था के समूह ब्रिक्स (ब्राज़ील,रूस,भारत,चीन,दक्षिण अफ्रीका) का सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में संपन्न हुआ । इस साल सम्मलेन की थीम थी ब्रिक्स और अफ्रीका के साथ इसकी साझेदारी । सम्मलेन में सदस्य देशो के बीच व्यापार परिषद् ,आपात कोष और विकास बैंक को लेकर सहमति बनी। हालाकि विकास बैंक को लेकर सदस्य देशो ने अभी और विचार विमर्श की ज़रूरत बताई हैं। ज्ञात हो ब्रिक्स देशो के पास विश्व का 25.9% भूभाग और 40% आबादी हैं. वैश्विक जीडीपी में इसका योगदान 15% हैं।
बढता दायरा

इस साल दक्षिण अफ्रीका में सम्मलेन की मेजबानी यह संकेत देती हैं कि यह समूह अफ्रीका तक अपने पाँव पसार रहा हैं।अफ्रीका काफी समय से उभरते हुए बाज़ार के साथ औपचारिक रूप से जुड़ने की तलाश में था। ब्रिक्स उसे यह मंच उपलब्ध करा सकता है।मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी ब्रिक्स के साथ जुड़ने और इसे ई ब्रिक्स बनाने की इच्छा पहले ही जता चुके हैं। अफ्रीका वैसे भी प्राकृतिक संसाधनों से लैस हैं। ब्रिक्स और अफ्रीका मिलकर कभी न की गयी इन आर्थिक क्षमताओं का दोहन कर सकते हैं। साथ ही ब्रिक्स देश अफ्रीका की युवा आबादी के आर्थिक सशक्तिकरण में अपना योगदान दे सकते हैं ।
ब्रिक्स और चीन का नेतृत्व परिवर्तन
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ब्रिक्स और चीन का नेतृत्व परिवर्तन
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इस साल ब्रिक्स सम्मेलन दूसरे कारण से भी महत्वपूर्ण था । नेतृत्व परिवर्तन के बाद चीन के नए राष्ट्रपति शी जिंगपिंग ने पहली बार सम्मलेन में शिरकत की। चीन ब्रिक्स को हमेशा से वैश्विक मुद्दों पर वैकल्पिक प्रस्ताव रखने का एक फोरम समझता है। चीन का ध्यान इस समय अमेरिका के एकध्रुवी वैश्विक व्यवस्था को बदलकर बहुध्रुवी वैश्विक व्यवस्था कायम करने में हैं। साथ ही चीन उभरती हुई अर्थव्यस्थाओ के साथ मिलकर एक अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था बनाने पर रणनीति बना रहा हैं, जो ओईसीडी को चुनौती दे सके। इसका नेतृत्व निर्विवाद रूप से चीन के हाथ में होगा। ब्रिक्स के माध्यम से वह अमेरिकी अधिपत्य और उसके प्रभुत्व को चुनौती दे सकता हैं।
मंदी के बीच आशा की किरण
इस समय ज्यादातर ओईसीडी देश मंदी की चपेट में हैं इसका असर ब्रिक्स समूह पर भी पड़ा हैं। खासकर भारत और चीन के जीडीपी पर। ब्रिक्स बाज़ार का एक दूसरे से जुड़ना और विदेशी निवेश और आपसी व्यापार को बढावा देकर इस आर्थिक मंदी से उबार सकता हैं।ब्रिक्स के जरिये भारत भी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओ से जुड़कर अपने आर्थिक हितो को साध सकता हैं।ब्रिक्स समूह में अभी तक सिर्फ चीन ही भारत के शीर्ष 15 व्यापारिक साझेदारो में शामिल हैं।
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इस समय ज्यादातर ओईसीडी देश मंदी की चपेट में हैं इसका असर ब्रिक्स समूह पर भी पड़ा हैं। खासकर भारत और चीन के जीडीपी पर। ब्रिक्स बाज़ार का एक दूसरे से जुड़ना और विदेशी निवेश और आपसी व्यापार को बढावा देकर इस आर्थिक मंदी से उबार सकता हैं।ब्रिक्स के जरिये भारत भी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओ से जुड़कर अपने आर्थिक हितो को साध सकता हैं।ब्रिक्स समूह में अभी तक सिर्फ चीन ही भारत के शीर्ष 15 व्यापारिक साझेदारो में शामिल हैं।
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सदस्य देशो के आपसी विवाद किसी से छुपे नहीं हैं। भारत का चीन के साथ सीमा विवाद, दक्षिण चीन सागर के प्रति चीन का जिद्दी रुख और पाकिस्तान के संदर्भ में भारत विरोधी नीति ब्रिक्स के उद्देश्यों को प्रभावित कर सकती हैं।साथ ही चीन के रूस के साथ भी मतभेद हैं मसलन ब्रिक्स के आर्थिक दर्शन को लेकर। उचित होगा की सदस्य देश आपसी मतभेद को दूर करे और पिछले 4 सम्मलेन में रखे गए मुद्दों पर सकारात्मक रुख अपनाये। कुल मिलाकर डरबन में जिस तरह से देशो ने साझेदारी का रुख दिखाया हैं उससे उम्मीद बढी हैं कि ये समूह आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में सामने आयेगा ।

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