Monday, 8 April 2013

चालू खाते का घाटा:एक और खतरे की आहट


भारत का चालू खाते का घाटा(सीएडी) खतरे की घंटी बजा रहा हैं. जीडीपी की तुलना में यह 6.7 फीसदी हो गया हैं..सीएडी देश में आ रही और यहाँ से जा रही विदेशी पूंजी का अंतर हैं. इसकी भरपाई के लिए विदेशी मुद्रा की ज़रूरत पड़ती हैं.

सुस्त विकास दर, गिरते निर्यात और बढ़ता आयात इस समस्या के मुख्य कारण हैं. खुद वित्त मंत्री ने माना हैं कि सीएडी  की भरपाई के लिए 75 अरब डॉलर की ज़रूरत पड़ेगी, जो केवल एफडीआई, एफआईआई और विदेशी क़र्ज़ से आ सकता हैं. लेकिन पिछले 9 महीनो में एफडीआई 20.7 अरब डॉलर से घटकर 15.3 अरब डॉलर रह गया हैं हालाकि इस अवधि में एफआईआई में वृद्धि हुई हैं लेकिन यह खतरे का संकेत पाते ही चले जाते हैं जिसका असर रूपये की कीमत पर पड़ता हैं. इसी दौरान भारत के लघु अवधि का क़र्ज़ भी लगातार बढ़ रहा हैं, कुल विदेशी कर्ज में इसका 24 फीसदी हिस्सा हैं. जिसकी वजह चालू खाते का घाटा हैं.

इस समस्या से निपटने के लिए लंबित पड़ी 200 परियोजनाओं को जल्द मंजूरी देनी होगी जिससे निवेश बढे साथ ही जनता को बचत के लिए प्रोत्साहित करना होगा और निर्यात को बढावा देना होगा .वरना अर्थव्यवस्था एक और बड़ी मुसीबत में फंसती हुई दिखाई दे रही है.

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