प्रतिष्ठित
टाइम
मैगज़ीन द्वारा दी गयी
अपनी अंडर अचीवर
की छवि से
निकलते हुए ,या
यूँ कहे
कि कोयला घोटाले
से अपनी साख
पर लगी कालिख को धोने
के लिए प्रधानमंत्री
ने आर्थिक सुधारो
की नई बयार
के लिए दरवाजे
खोल दिए है।
जिसकी शुरुआत
पिछले
महीने सिंगल ब्रांड रिटेल में 100%और मल्टी ब्रांड रीटेल क्षेत्र के भीतर 51% प्रत्यक्ष
विदेशी निवेश यानि एफडीआई के
अनुमति देने से
हुई ।जिसे बाद
में बीमा और
पेंशन के क्षेत्र
में भी लागू करने
का फरमान जरी
किया गया।
इसका असर प्रधानमंत्री
कि साख पर
ही नहीं पड़ेगा बल्कि
अमेरिका के राष्ट्रपति
ओबामा भी इस
साल होने वाले
राष्ट्रपति चुनावो में सीना
तान कर जा
सकते है । क्यूंकि
वो जानते
है कि अमेरिका
की अर्थव्यवस्था की
भलाई किस चीज़
में है।
और साथ ही
ब्लू आइड मनमोहन
सिंह भी जानते
है कि अमेरिकी
हितो को कैसे
पूरा करना है।
चाहे इसके लिए
अपनी सरकार को
ही दाव पर
लगाना पड़े या
फिर करोडो भारतीयों के
हितो की बलि
ही क्यूँ न
चढानी पड़े। पर
क्या एफडीआई वाकई
अच्छा है ?क्या
ये भारत में
बुनियादी ढांचे को सुधरेगा?
और सबसे अहम्
सवाल क्या भारत
की कृषि समस्याओ
का यही एक
राम - बाण इलाज
है ?
कृषि
विदेशी निवेश के पक्ष
में सरकार द्वारा
ये तर्क दिया
जा रहा है
कि इससे भारत
में किसानो की आमदानी
बढेगी , बिचौलिये खत्म होंगे
और उपभोक्ताओं को
कम कीमत में
सामान मिलेगा। साथ
ही कृषि उपज
की आपूर्ति में
होने वाली बर्बादी
पर अंकुश लगेगा।
मगर सरकार ये
भूल गयी है
की वालमार्ट खुद
में एक बड़ा
बिचौलिया है। मसलन
कृषि प्रसंस्करण, विपणन
और ढुलाई के
रोज़गार के
अवसरों के तहत
बिचौलियो की एक
नयी खेप पैदा हो
जाएगी ।अगर वालमार्ट किसानो
का इतना ही
बड़ा हित चिन्तक
है तो अमेरिका
हर साल कृषि
सब्सिडी पर इतनी
रकम क्यूँ खर्च
कर रहा है? अमेरिका
में 2008 में पारित
हुए कृषि बिल
में पांच वर्षो
के लिए 307 अरब
डॉलर के सहयोग
का प्रावधान है।
30 धनी देशों के ओइसीडी
समूह ने 2008 की
तुलना में 2009 में
कृषि सब्सिडी में
22 फीसदी की बढ़ोतरी
की है, जबकि
2008 में भी इसमें
21 प्रतिशत की वृद्धि
की गई थी।
2009 में इन देशों
ने 12.60 लाख करोड़
रुपये की सब्सिडी
किसानों को दी
थी।और ये भी
सत्य है की
यूरोप में प्रति
मिनट एक किसान
खेती छोड़ रहा
है। अगर
विदेशी निवेश वाकई अच्छा
है तो आज
भी यहाँ कृषि
सब्सिडी पर क्यूँ
निर्भर है? विश्व
व्यापार संगठन की वार्ताओं
में अमेरिका इस सब्सिडी
की जोरदार पैरवी
क्यूँ कर रहा
है। और दुनिया
में कही भी
ऐसा उदहारण नहीं
मिलता जो ये
साबित करे कि एफडीआई
के आने से
बुनियादी ढांचे में सुधार
आया हो ।
रोज़गार
भारत का खुदरा
व्यापर लगभग 1400-1500 बिलियन
डॉलर का है।
जिसमे 12 मिलियन
खुदरा व्यापारी लगभग
40 मिलियन लोगो
को रोज़गार उपलब्ध
करा रहे है।
इसके उलट वालमार्ट
का टर्नओवर करीब
420 बिलियन डॉलर
है और ये
केवल 2.1 मिलियन
लोगो को रोज़गार
उपलब्ध करा रहा
है। आज रिटेल
कृषि के बाद
देश में सबसे
ज्यादा रोज़गार देने वाला
क्षेत्र है जिसका
जीडीपी में योगदान
14-15प्रतिशत है। और
97 फीसदी कारोबार असंगठित खुदरा
विक्रेता चलाते हैं जिनकी
रोज़ी रोटी पर
वालमार्ट के आने
से खतरा पैदा
हो जायेगा। इसीलिए
जापान में इन
कंपनियों को अपने
स्टोर और काम्प्लेक्स
शहर के बाहर
और स्थानीय खुदरा
व्यापारियों कि इज़ाज़त
मिलने पर ही
खोलने दिया जाता
है। थाईलैंड में
इन बड़ी बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के प्रति
कोई खास उत्साह
नहीं मिलता क्यूंकि
वहा 60 हज़ार
छोटे काम-धंधे बंद
हो गए है
। और अमेरिका
के राष्ट्रपति ओबामा
ट्विटर से बार
बार छोटे दुकानों
से खरीदारी करने
की अपील कर
रहे है ।
राज्यों का विशेषाधिकार
अपनी नीति में
सरकार ने राज्यों
पर ये छोड़
दिया है कि
वो अपने वहा
रिटेल का आगमन
चाहते है या
नहीं। ये केवल
उन्हें शांत करने
का ही एक
जरिया है क्यूंकि
भारत ने द्विपक्षीय
निवेश संवर्धन और
संरक्षण करार (बीपा) पर
हस्ताक्षर किये है।
जिसके तहत उसे निवेशको
को राष्ट्रीय उपचार देना
होगा। इसमें
साफ तौर पर
घरेलू उद्योगों से
संसाधन लेने की
जरूरत संबंधी नियमन
को बाहर रखा
गया है.।
चूंकि भारत ने
इन्हीं शर्तों पर विश्व
व्यापार संगठन की सदस्यता
ली थी, लिहाजा
सिर्फ भारतीय उद्यमों
से 30 फीसदी संसाधन
लेने की बाध्यता
वह लागू नहीं
कर सकता। क्योंकि
इसे दूसरे देश
चुनौती दे देंगे
। भारत
वर्तमान में 70
देशो के साथ
बीपा समझोते पर
हस्ताक्षरी है ।इसीलिए
राज्य सरकारों को दुकान
और प्रतिष्ठान अधिनियम
के कारण उन्हें
अनुमति देनी ही
पड़ेगी नहीं तो
ये कंपनिया क़ानूनी
विकल्प अपना कर
राज्यों को बाध्य
कर सकती है
.।
ये बात
जग जाहिर है
कि बड़ी कंपनिया
किस प्रकार अपने
हित को साधने
के लिए लॉबिंग का इस्तेमाल
करती है। वॉशिंगटन से
जारी पीटीआई की
रिपोर्ट कहती है-
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स
और सीनेट में
दर्ज हालिया लॉबिंग
डिसक्लोज़र रिपोर्ट के मुताबिक
अमरीका की कंपनियों
और उद्योग समूहों
ने 2012 की शुरुआत
से लेकर अब
तक लॉबिंग पर
लाखों डॉलर खर्च
किए हैं। जिनके
तहत भारत में
एफडीआई, भारत के
कराधान ढांचे में बदलाव
और व्यापार संबंधी
अन्य मुद्दे शामिल
हैं.। रिपोर्ट
कहती है कि
वाल मार्ट ने
30 जून 2012 को खत्म
हुई तिमाही में
भारत में एफडीआई
से संबंधित व
अन्य मुद्दों पर
लॉबिंग के लिए
15 लाख डॉलर खर्च
किए हैं.।
रिपोर्ट बताती है कि
कंपनी ने 2010 के
शुरुवाती तीन महीनों
में भारत में
एफडीआई संबंधी परिचर्चा पर
छह करोड़ रुपए
खर्च किए हैं।.
साथ ही
ये निवेश मॉरिशस
जैसे टैक्स हेवन
देशो से आने
की सम्भावना है।
तो क्या एक
और बड़े घोटाले
की सुघबुगाहट तो
नहीं ?क्यूंकि अभी
ये देश कोयला
और 2G को भुला
नहीं है।

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