दिन भर की दौड़ धूप में कॉपी किताबो के बीच पुस्तकालय में बैठा, आज मन कह रहा है कि ज़िन्दगी में कितने लोगो से मिला, उन्हें जाना। और जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों से कुछ सिखा ,कुछ समझा और आगे बड़ा। पर इस रोज़मर्रा की भाग दौड़ में एक इंसान जो हमेशा से मेरे साथ तो रहा पर उसे मै आज तक समझ न सका। वो एक इंसान जो कल्पनाओ के सागर में गोते लगाता,सीप में से मोती निकालने की चाहत रखता। वो एक इंसान जो आसमान की ऊचाइयो को नापने की ख्वाहिश में अन्दर ही अन्दर अपने आप को जलाकर कुंदन करता। पर वही इंसान इतनी ऊचइयो में पहुचने के बाद एहसास करता है की ये ऊचाई तो पर्वत जैसी है। जिसमे सिर्फ बर्फ जमी होती है जो कब्र की तरह सफ़ेद और कफ़न की तरह ठंडी होती है। वो एक इंसान में खुद हूँ जो इतने सब के बाद भी अपने आप को पहचान न सका।
आज अटल जी की ऊचाई कविता के मर्म को मैंने जाना। उस सफलता का अर्थ कुछ नहीं जो आपको दूसरो से अलग तो बनाती है पर आपको उन सबसे दूर भी कर देती है ।और रह जाता है सिर्फ अकेलापन जो हर समय अखरता है। तब समझ में आता है की भीड़ से अलग रहने में वो मज़ा नहीं जो भीड़ को अपने साथ लेने में आता है। आज मैने जाना की उचाईयों को तो छूने की कोशिश करी पर अपने अन्दर की गहराइयों को नापने का प्रयास कभी नहीं किया। और मै अपने से ही दूर जाता रहा। जिसकी टीस आज मन में उठ रही है । पहले क्या था और अब क्या हूँ के बीच के सफ़र में वो एक इंसान को मै भूलता रहा जो मेरे मन के किसी एक कोने में बैठकर मेरे जाने के गम में सिसकिया ले रहा है और आहे भर रहा है ।
काश! कभी वो एक इंसान से फिर मिल सकू और उसे बता सकू की जीवन का सही अर्थ तूने ही मुझे बताया है ।
No comments:
Post a Comment